Skip to main content

Posts

इति श्वनोपनिषदि प्रथमः संवादः।

 श्वान कहता है— "मनुष्य! मुझे देखकर दया मत करो। पहले अपने भीतर की बेचैनी को देखो। मैं सड़क पर होकर भी शांत हूँ, तुम महलों में होकर भी अशांत हो।"
Recent posts

प्रथम विचार : श्वान-दृष्टि

  मनुष्य स्वयं को बुद्धिमान कहता है, पर श्वान उसे देखकर मुस्कुराता है। श्वान कहता है— "मैं भूखा होता हूँ तो भोजन खोजता हूँ। तृप्त होता हूँ तो विश्राम करता हूँ। किन्तु मनुष्य तृप्त होकर भी संग्रह करता है, और संग्रह करके भी भयभीत रहता है।" श्वान वर्तमान में जीता है, मनुष्य भविष्य की कल्पनाओं और अतीत की स्मृतियों में भटकता है।

श्वनोपनिषद् - मंगलाचरण

मंगलाचरण नमः उस सत्य को जो सब प्राणियों में समान रूप से व्याप्त है। नमः उस चेतना को जो राजा और रंक, मनुष्य और श्वान, सभी में एक ही प्रकाश से प्रकाशित है।

Shvanopanishad" (श्वानोपनिषद्) : Framework

यहाँ फ्रेमवर्क यह समझाएगा कि कैसे एक जीव 'आसक्ति' के बंधनों (कुत्ते की तरह गले में बंधी दुनिया की जंजीर) से छूटकर 'परम मुक्ति' (राम की सहज डोरी) को प्राप्त करता है।