यहाँ फ्रेमवर्क यह समझाएगा कि कैसे एक जीव 'आसक्ति' के बंधनों (कुत्ते की तरह गले में बंधी दुनिया की जंजीर) से छूटकर 'परम मुक्ति' (राम की सहज डोरी) को प्राप्त करता है।
कबीर कुत्ता राम का, मुतिया मेरा नाँव। गले राम की जेवड़ी, जित खींचे तित जाऊँ॥
Disclaimer : यदि श्वनोपनिषद् को देखकर या पढ़कर आपके भीतर क्रोध, आक्रोश या विरोध की भावना उत्पन्न होती है, तो उन भावनाओं की सम्पूर्ण जिम्मेदारी आपकी स्वयं की होगी। इस रचना का उद्देश्य किसी व्यक्ति, समुदाय, धर्म, परम्परा या आस्था की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। 🐕📜
यहाँ फ्रेमवर्क यह समझाएगा कि कैसे एक जीव 'आसक्ति' के बंधनों (कुत्ते की तरह गले में बंधी दुनिया की जंजीर) से छूटकर 'परम मुक्ति' (राम की सहज डोरी) को प्राप्त करता है।
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